[अथ द्वितीय काण्ड – प्रथम सूक्त]
१. परमधाम सूक्त
ऋषि - वेनः
देवता – ब्रह्मात्मा
छन्दः - त्रिष्टुप्
वे॒नस्तत्प॑श्यत्पर॒मं गुहा॒ यद्यत्र॒ विश्वं॒ भव॒त्येक॑रूपम्। इ॒दं पृश्नि॑रदुह॒ज्जाय॑मानाः स्व॒र्विदो॑ अ॒भ्य॑नूषत॒ व्राः ॥१॥
(वेनः) बुद्धिमान् पुरुष (तत्) उस (परमम्) अति श्रेष्ठ परब्रह्म को (पश्यत्=०–ति) देखता है, (यत्) जो ब्रह्म (गुहा=गुहायाम्) गुफा के भीतर [वर्त्तमान है] और (यत्र) जिसमें (विश्वम्) सब जगत् (एकरूपम्) एकरूप [निरन्तर व्याप्त] (भवति) वर्त्तमान है। (इदम्) इस परम ऐश्वर्य के कारण [ब्रह्मज्ञान] को (पृश्निः) [ईश्वर से] स्पर्श रखनेवाले मनुष्य ने (जायमानाः) उत्पन्न होती हुयी अनेक रचनाओं से (अदुहत्) दुहा है और (स्वर्विदः) सुखस्वरूप वा आदित्यवर्ण ब्रह्म के जाननेवाले (व्राः) वरणीय विद्वानों ने [उस ब्रह्म की] (अभि) विविध प्रकार से (अनूषत) स्तुति की है।
वह परम ब्रह्म सूक्ष्म तो ऐसा है कि वह (गुहा) हृदय आदि प्रत्येक सूक्ष्म स्थान का अन्तर्यामी है और स्थूल भी ऐसा है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड उसके भीतर समा रहा है। धीर ध्यानी महात्मा उस जगदीश्वर की अनन्त रचनाओं से विज्ञान और उपकार प्राप्त करके मुक्त कण्ठ से आत्मसमर्पण करते हुए उसकी स्तुति करते और ब्रह्मानन्द में मग्न रहते हैं।
देखिये–यजुर्वेद अध्याय ३२ मन्त्र ८।
वे॒नस्तत् प॑श्यन्निहि॑तं गुहा सद् यत्र॒ विश्वं॒ भव॒त्येक॑नीडम्। तस्मि॑न्नि॒द सं च॒ वि चै॑ति॒ सर्व॒ स ओतः प्रोत॑श्च वि॒भूः प्र॒जासु॑ ॥१॥
(वेनः) पण्डितजन (तत्) उस (गुहा) बुद्धि वा गुप्त कारण में (निहितम्) वर्त्तमान (सत्) नित्यस्वरूप ब्रह्म को (पश्यत्=०–ति) देखता है, (यत्र) जिस ब्रह्म में (विश्वम्) सब जगत् (एकनीडम्) एक आश्रयवाला (भवति) होता है। (च) और (तस्मिन्) उसमें (इदम्) यह (सर्वम्) सब जगत् (सम्) मिलकर (च) और (वि) अलग-अलग होकर (एति) चेष्टा करता है, (सः) वह (विभूः) सर्वव्यापक परमात्मा (प्रजासु) प्रजाओं में [वस्त्र में सूत के समान] (ओतः) ताना किये हुए (च) और (प्रोतः) बाना किये हुए है।
प्र तद्वो॑चेद॒मृत॑स्य वि॒द्वान् ग॑न्ध॒र्वो धाम॑ पर॒मं गुहा॒ यत्। त्रीणि॑ प॒दानि॒ निहि॑ता॒ गुहा॑स्य॒ यस्तानि॒ वेद॒ स पि॒तुष्पि॒तास॑त् ॥२॥
(विद्वान्) विद्वान् (गन्धर्वः) विद्या का धारण करनेवाला पुरुष (अमृतस्य) अविनाशी ब्रह्म के (तत्) उस (परमम्) सबसे ऊँचे (धाम) पद का (प्रवोचद्) उपदेश करे (यत्) जो पद (गुहा=गुहायाम्) गुफा [प्रत्येक अगम्य पदार्थ हृदय आदि] के भीतर है। (अस्य) इस [ब्रह्म] की (गुहा) गुफा [अगम्यशक्ति] में (त्रीणि) तीनों (पदानि) पद (निहिता=०–तानि) ठहरे हुए हैं, (यः) जो [विद्वान् पुरुष] (तानि) उनको (वेद) जान लेता है, (सः) वह (पितुः) पिता का (पिता) पिता (असत्) हो जाता है।
विद्वान् महात्मा पुरुष उस परब्रह्म की महिमा का सदा उपदेश करते रहते हैं। वह ब्रह्म सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान् से महान् है। उसके ही वश में तीन पद, अर्थात् संसार की सृष्टि, स्थिति और नाश ये तीनों अवस्थाएँ, अथवा भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान, तीनों काल, अथवा सत्त्व, रज और तम, तीनों गुण वर्त्तमान हैं। जिस महापुरुष योगी को इन अवस्थाओं का विज्ञान व्यष्टि और समष्टिरूप से होता है, वह पिता का पिता अर्थात् महाविज्ञानियों में महाविज्ञानी होता है।
१–यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में है–अ० ३२। म० ९। २–मनु महाराज ने कहा है–अ० २।१५३।
अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः। अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥१॥
अज्ञानी ही बालक होता है, वेदोपदेष्टा पिता होता है। [मुनि लोग] अज्ञानी को ही बालक और वेदोपदेष्टा को ही पिता कहते हैं।
स नः॑ पि॒ता ज॑नि॒ता स उ॒त बन्धु॒र्धामा॑नि वेद॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। यो दे॒वानां॑ नाम॒ध एक॑ ए॒व तं सं॑प्र॒श्नं भुव॑ना यन्ति॒ सर्वा॑ ॥३॥
(सः) वही [ईश्वर] (नः) हमारा (पिता) पालक और (जनिता) जनक, (उत) और (सः) वही (बन्धुः) बान्धव है, वह (विश्वा=विश्वानि) सब (धामानि) पदों [अवस्थाओं] और (भुवनानि) लोकों को (वेद) जानता है। (यः) जो [परमेश्वर] (एकः) अकेला (एव) ही (देवानाम्) दिव्य गुणवाले पदार्थों का (नामधः) नाम रखनेवाला है, (संप्रश्नम्) यथाविधि पूँछने योग्य (तम्) उसको (सर्वा=सर्वाणि) सब (भुवना=०–नानि) प्राणी (यन्ति) प्राप्त होते हैं।
परमेश्वर संसार का माता, पिता, बन्धु और सर्वज्ञ और सर्वान्तर्यामी है, वही पिता के समान सृष्टि के पदार्थों का नामकरण संस्कार करता है, जैसे, सूर्य, पृथिवी, मनुष्य, गौ, घोड़ा आदि। विद्वान् लोग सत्सङ्ग करके उस जगदीश्वर को पाते और आनन्द भोगते हैं।
(नामधः) के स्थान पर सायणभाष्य, ऋग्वेद और यजुर्वेद में [नामधाः] है। २–यह मन्त्र ऋग्वेद १०।८२।३। तथा य० १७।२७। में कुछ भेद से है।
परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी स॒द्य आ॑य॒मुपा॑तिष्ठे प्रथम॒जामृ॒तस्य॑। वाच॑मिव व॒क्तरि॑ भुवने॒ष्ठा धा॒स्युरे॒ष न॒न्वे॑३षो अ॒ग्निः ॥४॥
(सद्यः) अभी (द्यावापृथिवी=०–व्यौ) सूर्य और पृथिवीलोक में (परि=परीत्य) घूमता हुआ (आयम्) मैं [प्राणी] आया हूँ (ऋतस्य) सत्यनियम के (प्रथमजाम्) पहिले से उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर] को (उप+आतिष्ठे) मैं प्राप्त होता हूँ, (इव) जैसे [श्रोता गण] (वक्तरि) वक्ता में [वर्त्तमान] (वाचम्) वाणी को [प्राप्त होते हैं।] (भुवनेष्ठाः) सम्पूर्ण जगत् में स्थित (एषः) यह परमेश्वर (धास्युः) पोषण करनेवाला और (ननु) अवश्य करके (एषः) यह (अग्निः) अग्नि [सदृश उपकारी वा व्यापक परमात्मा] है।
तत्त्ववेत्ता पुरुष सूर्य और पृथिवी आदि प्रत्येक कार्यरूप पदार्थ के आकर्षण, धारणादि का यथार्थज्ञान प्राप्त करके परमात्मा को साक्षात् करता है, जैसे श्रोता लोग वक्ता के बोलने पर उसकी वाणी के अभिप्राय को अपने आत्मा में ग्रहण करते हैं। वही ईश्वर वेदरूप सत्यनियम की सृष्टि के पहिले प्रकट करता और सब जगत् का धारण और पोषण करता रहता है, जैसे सूर्य का ताप अन्न आदि को परिपक्व करके और जाठर अग्नि भोजन को पचाकर और उससे रुधिर आदि को उत्पन्न करके शरीर को पुष्ट करता है। पातञ्जल योगदर्शन में वर्णन है–पाद ३ सूत्र २५।
भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥
सूर्य में संयम से लोकों का ज्ञान [योगी को] होता है। अर्थात् वह सूर्य को केन्द्र मानकर सूर्य से लोकों का सम्बन्ध और परमेश्वर से सूर्य का सम्बन्ध अपनी विद्या द्वारा जान लेता है।
परि॒ विश्वा॒ भुव॑नान्यायमृ॒तस्य॒ तन्तुं॒ वित॑तं दृ॒शे कम्। यत्र॑ दे॒वा अ॒मृत॑मानशा॒नाः स॑मा॒ने योना॒वध्यैर॑यन्त ॥५॥
(विश्वा=विश्वानि) सब (भुवनानि) लोकों में (परि=परीत्य) घूमकर (ऋतस्य) सत्यनियम के (विततम्) सब और फैले हुए (तन्तुम्) फैलनेवाले [अथवा वस्त्र में सूत के समान सर्वव्यापक] (कम्) प्रजापति परमेश्वर को (दृशे) देखने के लिये (आयम्) मैं [प्राणी] आया हूँ। (यत्र) जिस [परमात्मा] में (देवाः) तेजस्वी महात्मा (अमृतम्) अमृत [अमरण अर्थात् जीवन की सफलता वा अनश्वर आनन्द] को (आनशानाः) भोगते हुए (समाने) साधारण (योनौ) आदि कारण ब्रह्म में [प्रवृष्ट होकर] (अधि) ऊपर (ऐरयन्त) पहुँचे हैं।
ध्यानी, धीर, वीर पुरुष सामान्यतः समष्टिरूप से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परीक्षा करके सब स्थान में व्यापक जगदीश्वर को साक्षात् करके आनन्द भोगते हैं और यह अनुभव करते हैं, कि सब महात्मा अपने को उस परम पिता में लय करके आत्मा की परम उन्नति करते हैं, अर्थात् जो स्वार्थ छोड़कर आत्मसमर्पण करते हैं, वही परोपकारी सज्जन परम आनन्द की सिद्धि [मुक्ति] को सदा हस्तगत करते हैं ।
यजुर्वेद अ० ३२ म० १० इस प्रकार है।
स नो॒ बन्धु॑र्जनि॒ता स वि॑धा॒ता धामा॑नि वेद भुव॑नानि॒ विश्वा॑। यत्र॑ दे॒वा अ॒मृत॒मानशा॒नास्तृ॒तीये॒ धाम॑न्न॒ध्यैर॑यन्त ॥१॥
वही हमारा बन्धु और उत्पन्न करनेहारा है और वही पोषण करनेहारा परमेश्वर सब (धामानि) अवस्थाओं और (भुवनानि) लोकों को जानता है, जिस तीसरे लोक परब्रह्म [प्राणियों और सब भुवनों के स्वामी] में तेजस्वीजन अमृत को भोगते हुए ऊपर पहुँचे हैं।
[अथ द्वितीय काण्ड – द्वितीय सूक्त]
२. भुवनपति सूक्त
ऋषि - मातृनामा
देवता – गन्धर्वाप्सरसः
छन्दः – १. विराड्जगती; २., ३. त्रिष्टुप्; ४. विराड्गायत्री, ५. भुरिगनुष्टुप्
दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वो भुव॑नस्य॒ यस्पति॒रेक॑ ए॒व न॑म॒स्यो॑ वि॒क्ष्वीड्यः॑। तं त्वा॑ यौमि॒ ब्रह्म॑णा दिव्य देव॒ नम॑स्ते अस्तु दि॒वि ते॑ स॒धस्थ॑म् ॥१॥
(यः) जो तू (दिव्यः) दिव्य [अद्भुतस्वभाव] (गन्धर्वः) गन्धर्व [भूमि, सूर्य, वेदवाणी वा गति का धारण करनेवाला] (भुवनस्य) सब ब्रह्माण्ड का (एकः) एक (एव) ही (पतिः) स्वामी, (विक्षु) सब प्रजाओं [वा मनुष्यों] में (नमस्यः) नमस्कारयोग्य और (ईड्यः) स्तुतियोग्य है। (तम्) उस (त्वा) तुझसे, (दिव्य) हे अद्भुतस्वभाव (देव) जयशील परमेश्वर ! (ब्रह्मणा) वेद द्वारा (यौमि) मैं मिलता हूँ, (ते) तेरे लिये (नमः) नमस्कार (अस्तु) हो, (दिवि) प्रत्येक व्यवहार में (ते) तेरा (सधस्थम्) सहवास है।
धीर, वीर, ऋषि, मुनि पुरुष उस परम पिता जगदीश्वर की सत्ता को अपने में और प्रत्येक पदार्थ में वैदिकज्ञान की प्राप्ति से साक्षात् करके अभिमान छोड़कर आत्मबल बढ़ाते हुए आनन्द भोगते हैं।
१–(गन्धर्व) परमेश्वर का नाम है,
देखिये–ऋग्वेद मं० ९ सू० ८३ म० ४
ग॒न्ध॒र्व इ॒त्था प॒दम॑स्य रक्षति॒ पाति॑ दे॒वानां॒ जनि॑मा॒न्यद्भु॑तः। गृ॒भ्णाति॑ रि॒पुं नि॒धया॑ नि॒धाप॑तिः सु॒कृत्त॑मा॒ मधु॑नो भ॒क्षमाशत ॥१॥
(गन्धर्वः) पृथिवी आदि का धारण करनेवाला, गन्धर्व, (इत्था) सत्यपन से (अस्य) इस जगत् की (पदम्) स्थिति की (रक्षति) रक्षा करता है और वह (अद्भुतः) आश्चर्यस्वरूप (देवानाम्) दिव्य गुणवालों के (जनिमानि) जन्मों अर्थात् कुलों की (पाति) चौकसी रखता है। (निधापतिः) पाश [बन्धन] का स्वामी (निधया) पाश से (रिपुम्) वैरी को (गृभ्णाति) पकड़ता है, (सुकृत्तमाः) बड़े-बड़े सुकृती पुण्यात्मा लोगों ने (मधुनः) मधुर रस के (भक्षम्) भोग को (आशत) भोगा है ॥
दि॒वि स्पृ॒ष्टो य॑ज॒तः सूर्य॑त्वगवया॒ता हर॑सो॒ दैव्य॑स्य। मृ॒डाद्ग॑न्ध॒र्वो भुव॑नस्य॒ यस्पति॒रेक॑ ए॒व न॑म॒स्यः॑ सु॒शेवाः॑ ॥२॥
(दिवि) प्रत्येक व्यवहार में (स्पृष्टः) स्पर्श किये हुए, (यजतः) पूजनीय, (सूर्यत्वक्) सूर्य को त्वचा अर्थात् रूप देनेवाला, (दैव्यस्य) मदशील [प्रमत्त] मनुष्य के, अथवा आधिदैविक (हरसः) क्रोध का (अवयाता) हटानेवाला वह परमेश्वर (मृडात्) [सबको] आनन्द देवे, (यः) जो (गन्धर्वः) गन्धर्व, [म० १। भूमि, सूर्य, वेदवाणी वा गति का धारण करनेवाला] (भुवनस्य) सब जगत् का (एकः) एक (एव) ही (पतिः) स्वामी (नमस्यः) नमस्कारयोग्य और (सुशेवाः) अत्यन्त सेवायोग्य है।
वह सर्वव्यापी, सूर्यादिप्रकाशक जगत्पिता परमेश्वर हमें सामर्थ्य देकर हमारे कुक्रोध और आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक क्लेश का नाश करता है। उस अद्वितीय, सर्वसेवनीय परमेश्वर की उपासना से सबको आनन्द मिलता है ।
१–परमेश्वर आदित्यवर्णरूप है, य० अ० ३१।१८ ॥
वेदा॒हमे॒तं पुरु॑षं म॒हान्त॑मादि॒त्यव॑र्णं॒ तम॑सः प॒रस्ता॑त्। तमे॒व वि॑दि॒त्वाति॑ मृ॒त्युमे॑ति॒ नान्यः पन्था॑ विद्यतेऽय॑नाय ॥१॥
(अहम्) मैं, (तमसः) अन्धकार वा अज्ञान से (परस्तात्) परे होकर, (एतम्) इस (महान्तम्) पूजनीय वा सबसे बड़े (आदित्यवर्णम्) सूर्य को रूप देनेवाले (पुरुषम्) अग्रगामी परमात्मा को (वेद) जानता हूँ। (तम्) उसको (एव) ही (विदित्वा) जानकर [जीव] (मृत्युम्) मृत्यु को (अत्येति) लाँघ जाता है, (अन्यः) दूसरा (पन्थाः) मार्ग (अयनाय) चलने के लिये (न) नहीं (विद्यते) विद्यमान है ॥
२–परमेश्वर ने सूर्य और चन्द्र बनाया है। ऋग्वेद म० १०। सू० १९०।३।
सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसौ॑ धा॒ता य॑था पू॒र्वम॑कल्पयत्।
(धाता) विधाता ने (सूर्याचन्द्रमसौ) सूर्य और चन्द्र को (यथापूर्वम्) पहिले के समान (अकल्पयत्) बनाया है ॥
अ॑नव॒द्याभिः॒ समु॑ जग्म आभिरप्स॒रास्वपि॑ गन्ध॒र्व आ॑सीत्। स॑मु॒द्र आ॑सां॒ सद॑नं म आहु॒र्यतः॑ स॒द्य आ च॒ परा॑ च॒ यन्ति॑ ॥३॥
(गन्धर्वः) गन्धर्व [म० १] (आभिः) इन (अनवद्याभिः) निर्दोष [अप्सराओं] के साथ (उ) अवश्य (संजग्मे) संगतिवाला था और (अप्सरासु) अप्सराओं में [सब प्राणियों, वा अन्तरिक्ष वा बीजरूप जल में व्यापक, वा उत्तमरूपवाली अपनी शक्तियों में] (अपि) निःसन्देह (आसीत्) वर्त्तमान था। (आसाम्) इन [अप्सराओं] का (सदनम्) घर (समुद्रे) अन्तरिक्ष में [वा समुद्ररूप गम्भीर स्थान में] (मे) मुझको (आहुः) वे बताते हैं, (यतः) जिस स्थान से वे (च) अवश्य (आ यन्ति) आती (च) और (परा=परायन्ति) दूर चली जाती हैं।
(गन्धर्व) भूमि आदि लोकों और वेदवाणी का धारक (अप्सराओं) अर्थात् सब प्राणियों और जल आदि सृष्टि के उपादान कारण पदार्थों में वर्त्तमान अपनी शक्तियों के साथ विराजमान रहता है, ये अद्भुत शक्तियाँ अति विस्तीर्ण आकाश में वर्त्तमान रहती और मनुष्य आदि के शरीरों में परमाणुओं की संयोगदशा में दृश्य और उनकी वियोगदशा में अदृश्य हो जाती हैं।
टिप्पणी–(गन्धर्वः) और (अप्सरसः) शब्दों के लिये
यजुर्वेद अ० १८ म० ३८–४३, छह मन्त्र देखें। वहाँ (अप्सरसः) शब्द है, जो (अप्सराः) शब्द का पर्य्यायवाची है। ऋ॒ता॒षाडृ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वस्तस्यौष॑धयोऽप्स॒रसो॒ मुदो नाम॑। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ताभ्यः॒ स्वाहा॑ ।
(ऋताषाट्) सत्यनियम का सहनेवाला, (ऋतधामा) सत्य प्रभाववाला, (अग्निः) सर्वव्यापक, वा अग्निसमान रक्षक, परमेश्वर (गन्धर्वः) सूर्य, पृथिवी और वेदवाणी आदि का धारण करनेवाला है। (तस्य) उसको [गन्धर्व की बनायी] (मुदः) आनन्द देनेवाली (औषधयः) ओषधें [अन्नादि वस्तुएँ] (नाम) प्रसिद्धरूप से (अप्सरसः) अप्सराएँ अर्थात् आकाश, वा प्राणों, व जल में चलनेवाली वा उत्तमरूपवाली सामग्री हैं। (सः) वह परमेश्वर (नः) हमारे लिये (इदम्) इस (ब्रह्म) ब्राह्मणकुल और (क्षत्रम्) क्षत्रियकुल की (पातु) रक्षा करे। (तस्मै) उस परमेश्वर को (स्वाहा) सुन्दर वाणी और (वाट्) आवाहन और (ताभ्यः) उन सामग्रियों के लिये (स्वाहा) सुन्दर स्तुति है ॥ यह मन्त्र ३८ वाँ है। इसी प्रकार अन्य पाँच मन्त्रों में (गन्धर्वः) शब्द (सूर्यः, चन्द्रमाः, वातः, यज्ञः, मनः) शब्दों के साथ और (अप्सरसः) शब्द (मरीचयः, नक्षत्राणि, आपः, दक्षिणाः, ऋक्सामानि) शब्दों के साथ क्रम से आये हैं ॥
अभ्रि॑ये॒ दिद्यु॒न्नक्ष॑त्रिये॒ या वि॒श्वाव॑सुं गन्ध॒र्वं सच॑ध्वे। ताभ्यो॑ वो देवी॒र्नम॒ इत्कृ॑णोमि ॥४॥
(अभ्रिये) अभ्र [मेघ] में [रहनेवाली], (दिद्युत्=०–ति) बिजुली में [वर्तमान] और (नक्षत्रिये) नक्षत्रों में [रहनेवाली] (याः) जो तुम सब (विश्वावसुम्) सब प्रकार के धनों के वा सब निवासस्थानों [लोकों] के स्वामी (गन्धर्वम्) गन्धर्व [पृथिवी, सूर्य वा वेदवाणी के धारण करनेवाले परमेश्वर] की (सचध्वे) सेवा करती हो। (देवीः=हे देव्यः !) हे देवियो ! [दिव्य अर्थात् अद्भुत, गुणवालियों !] (ताः) उन (वः) तुमको (नमः) नमस्कार (इत्) अवश्य (कृणोमि) मैं करता हूँ ।
यहाँ शक्तियों से शक्तिमान् परमेश्वर का ग्रहण है। संसार के प्रत्येक पदार्थ के अवलोकन से देखा जाता है कि ये अप्सराएँ [परमेश्वर की अनन्त और अद्भुतशक्तियाँ] परमेश्वर के वशीभूत होकर सब सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और अन्त का कारण हैं। उन शक्तियों अर्थात् उनके स्वामी जगदीश्वर को बड़े-छोटे प्राणी नम्रता से स्वीकार करते और उपकारों को विचारकर उपकारी बनाकर आनन्द भोगते हैं।
याः क्ल॒न्दास्तमि॑षीचयो॒ऽक्षका॑मा मनो॒मुहः॑। ताभ्यो॑ गन्ध॒र्वभ्यो॑ ऽप्स॒राभ्यो॑ऽकरं॒ नमः॑ ॥५॥
(याः) जो (क्लन्दाः) आवाहन करनेहारी, (तमिषीचयः) इच्छा की सीचने [पूरा, करने] हारी, (अक्षकामाः) अवहारों में कामना करानेवाली, (मनोमुहः) मन को आश्चर्य में करनेवाली हैं। (ताभ्यः) उन (गन्धर्वपत्नीभ्यः) गन्धर्व की पत्नी [परमेश्वर की रक्षा में रहनेवाली] (अप्सराभ्यः) अप्सराओं [प्राणियों में रहनेवाली ईश्वरशक्तियों] को मैंने (नमः) नमस्कार (अकरम्) किया है।
इस मन्त्र में भी अप्सराओं अर्थात् शक्तियों से उनके स्वामी परमेश्वर का ग्रहण है। वह परमेश्वर दुष्टों पर गरजता और शिष्टों का आवाहन करता, अनन्त बलवान्, उत्तम कर्मों में प्रीति करानेवाला और मनोहरस्वभाव है, सब जड़ और चेतन नमस्कार करके उस सर्वशक्तिमान् की आज्ञा मानते और आनन्दित होते हैं।
[अथ द्वितीय काण्ड – तृतीय सूक्त]
३. आस्रावभेषज सूक्त
ऋषि - अङ्गिराः
देवता – भैषज्यम्, आयुः, धन्वन्तरिः
छन्दः – १-५. अनुष्टुप्; ६. त्रिपात्स्वराडुपरिष्टान्महाबृहती
अ॒दो यद॑व॒धाव॑त्यव॒त्कमधि॒ पर्व॑तात्। तत्ते॑ कृणोमि भेष॒जं सुभे॑षजं॒ यथास॑सि ॥१॥
(अदः) यह (यत्) जो संगतियोग्य ब्रह्म (अवत्कम्) नित्य चलनेवाला जलप्रवाह [के समान] (पर्वतात् अधि) पर्वत के ऊपर से (अवधावति) नीचे को दौड़ता आता है। [हे औषध !] (तत्) उस [ब्रह्म] को (ते) तेरे लिये (भेषजम्) औषध (कृणोमि) मैं बनाता हूँ, (यथा) जिससे कि (सुभेषजम्) उत्तम औषध (अससि) तू हो जावे।
हिमवाले पर्वतों से नदियाँ ग्रीष्म ऋतु में भी बहती रहती और अन्न आदि औषधों को हरा-भरा करके अनेक विधि से जगत् का पोषण करती हैं, इसी प्रकार औषध का औषध, वह ब्रह्म सबके हृदय में व्यापक हो रहा है। सब मनुष्य ब्रह्मचर्यसेवन और सुविधाग्रहण से शारीरिक और मानसिक रोगों की निवृत्ति करके सदा उपकारी बनें और आनन्द भोगें।
आद॒ङ्गा कु॒विद॒ङ्गा श॒तं या भे॑ष॒जानि॑ ते। तेषा॑मसि॒ त्वमु॑त्त॒मम॑नास्रा॒वमरो॑गणम् ॥२॥
(अङ्ग) हे ! (अङ्ग) हे [ब्रह्म !] (आत्) फिर (कुवित्) अनेक प्रकार से (या=यानि) जो (ते) तेरी [बनायी] (शतम्) सौ [असंख्य] (भेषजानि) भयनिवर्त्तक औषधें हैं, (तेषाम्) उनमें से (त्वम्) तू आप (उत्तमम्) उत्तम गुणवाला, (अनास्रावम्) बड़े क्लेश का हटानेवाला और (अरोगम्) रोग दूर करनेवाला (असि) है।
संसार की सब ओषधियों में क्लेशनाशक और रोगनिवर्त्तक शक्ति का देनेवाला वही ओषधियों का ओषधि परब्रह्म है।
नी॒चैः ख॑न॒न्त्यसु॑रा अरु॒स्राण॑मि॒दं म॒हत्। तदा॑स्रा॒वस्य॑ भेष॒जं तदु॒ रोग॑मनीनशत् ॥३॥
(असुराः) बुद्धिमान् पुरुष (इदम्) इस (अरुस्राणम्) व्रण [स्फोर=फोड़े] को पकाकर भर देनेवाली, (महत्) उत्तम औषध को (नीचैः) नीचे-नीचे (खनन्ति) खोदते जाते हैं। (तत्) वही विस्तृत ब्रह्म (आस्रावस्य) बड़े क्लेश की (भेषजम्) औषध है, (तत्) उसने (उ) ही (रोगम्) रोग को (अनीनशत्) नाश कर दिया है।
जैसे सद्वैद्य बड़े-बड़े परिश्रम और परीक्षा करके उत्तम औषधों को लाकर रोगों की निवृत्ति करके प्राणियों को स्वस्थ करते हैं, वैसे ही विज्ञानियों ने निर्णय किया है कि उस परमेश्वर ने आदि सृष्टि में ही मानसिक और शारीरिक रोगों की ओषधि उत्पन्न कर दी है।
उ॑प॒जीका॒ उद्भ॑रन्ति समु॒द्रादधि॑ भेष॒जम्। तदा॑स्रा॒वस्य॑ भेष॒जं तदु॒ रोग॑मशीशमत् ॥४॥
(उपजीकाः) [परमेश्वर के] आश्रित पुरुष (समुद्रात् अधि) आकाश [समस्त जगत्] में से (भेषजम्) भयनिवारक ब्रह्म को, (उद्भरन्ति) ऊपर निकालते हैं। (तत्) वही [ब्रह्म] (आस्रावस्य) बड़े क्लेश का (भेषजम्) औषध है, (तत्) उसने (उ) ही (रोगम्) रोग को (अशीशमत्) शान्त कर दिया है।
परमेश्वर का सहारा रखनेवाले पुरुष संसार के प्रत्येक पदार्थ में ईश्वर को पाते हैं और उस आदिकारण की महिमा को साक्षात् करके अपने सब क्लेशों का नाश करके आनन्द भोगते हैं।
अ॑रु॒स्राण॑मि॒दं म॒हत्पृ॑थि॒व्या अध्युद्भृ॑तम्। तदा॑स्रा॒वस्य॑ भेष॒जं तदु॒ रोग॑मनीनशत् ॥५॥
(इदम्) यह (अरुस्राणम्) फोड़े को पकाकर भरनेवाला (महत्) उत्तम [औषध] (पृथिव्याः) पृथिवी से (अधि) ऊपर (उद्भृतम्) निकालकर लाया गया है। (तत्) वही [ज्ञान] (आस्रावस्य) बड़े क्लेश का (भेषजम्) औषध है, (तत्) उसने (उ) ही (रोगम्) रोग को (अनीनशत्) नाश कर दिया है।
महाक्लेशनाशक ब्रह्मज्ञानरूप औषध पृथिवी आदि लोकों के प्रत्येक पदार्थ में वर्त्तमान है, मनुष्य उसको प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करें और रोगों की निवृत्ति करके स्वस्थचित्त होकर आनन्दित रहें।
शं नो॑ भवन्त्वा॒प ओष॑धयः शि॒वाः। इन्द्र॑स्य॒ वज्रो॒ अप॑ हन्तु र॒क्षस॑ आ॒राद्विसृ॑ष्टा॒ इष॑वः पतन्तु र॒क्षसा॑म् ॥६॥
(आपः) जल और (ओषधयः) उष्णता धारण करनेवाली वा ताप नाश करनेवाली अन्नादि ओषधें (नः) हमारे लिये (शम्) शान्तिकारक और (शिवाः) मङ्गलदायक (भवन्तु) होवें। (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवाले पुरुष का (वज्रः) (रक्षसः) राक्षस का (अपहन्तु) हनन कर डाले, (रक्षसाम्) राक्षसों के (विसृष्टाः) छोड़े हुए (इषवः) वाण (आरात्) दूर (पतन्तु) गिरें।
परमेश्वर के अनुग्रह से हम पुरुषार्थ करते रहें, जिससे जल, अन्न आदि सब पदार्थ शुद्ध रहकर प्रजा में आरोग्यता बढ़ावें और जैसे राजा चोर, डाकू आदि दुष्टों को दण्ड देता है कि प्रजागण कष्ट न पावें और सदा आनन्द भोगें, ऐसे ही हम अपने दोषों का नाश करके आनन्द भोगें।
[अथ द्वितीय काण्ड – चतुर्थ सूक्त]
४. दीर्घायु प्राप्ति सूक्त
ऋषि - अथर्वा
देवता – चन्द्रमा अथवा जङ्गिडः
छन्दः - १. विराट्प्रस्तारपङ्क्तिः, २-६. अनुष्टुप्
दी॑र्घायु॒त्वाय॑ बृहते रणा॒यारि॑ष्यन्तो॒ दक्ष॑माणाः॒ सदै॒व। म॒णिं वि॑ष्कन्ध॒दूष॑णं जङ्गि॒डं बि॑भृमो व॒यम् ॥१॥
(दीर्घायुत्वाय) बड़ी आयु के लिये और (बृहते) बड़े (रणाय) रण में [जीत] वा रमण के लिये (अरिष्यन्तः) [किसी को] न सताते हुए और (सदा एव) सदा ही, (दक्षमाणाः) वृद्धि करते हुए (वयम्) हम लोग (विष्कन्धदूषणम्) विघ्ननिवारक और (मणिम्) प्रशंसनीय (जङ्गिडम्) शरीरभक्षक रोग वा पाप के निगलनेवाले [औषध वा परमेश्वर] को (बिभृमः) हम धारण करें।
जगत् में कीर्त्तिमान् होना ही आयु का बढ़ाना है। मनुष्यों को परमेश्वर के ज्ञान और पथ्य पदार्थों के सेवन से पुरुषार्थपूर्वक पाप और रोगरूप विघ्नों को हटाकर सत्पुरुषों की वृद्धि में अपनी और संसार की उन्नति समझकर सदा सुख भोगना चाहिये।
१–सायणभाष्य में (दक्षमाणाः) के स्थान में [रक्षमाणाः] पद है।
२–सायणाचार्य ने (जङ्गिड) वृक्षविशेष वाराणसी में प्रसिद्ध बताया है ॥
ज॑ङ्गि॒डो ज॒म्भाद्वि॑श॒राद्विष्क॑न्धादभि॒शोच॑नात्। म॒णिः स॒हस्र॑वीर्यः॒ परि॑ णः पातु वि॒श्वतः॑ ॥२॥
(सहस्रवीर्यः) सहस्रों सामर्थ्यवाला, (जङ्गिडः) शरीरभक्षक रोगों का निगलनेवाला (मणिः) मणिरूप अति श्रेष्ठ औषध वा परमेश्वर (नः) हमको (जम्भात्) नाश से, (विशरात्) हिंसा से, (विष्कन्धात्) विघ्न से और (अभिशोचनात्) महा शोक से, (विश्वतः) सब प्रकार और (परि) सब ओर (पातु) बचावे।
मनुष्य सर्वरक्षक और सर्वशक्तिमान् परमेश्वर में श्रद्धालु होकर पथ्य पदार्थों का सेवन करता हुआ पुरुषार्थ करे कि आलस्य आदि दुर्व्यसन और हिंसक राक्षस आदि रोग न सतावें, किन्तु सुरक्षित होकर आनन्द प्राप्त करे।
अ॒यं विष्क॑न्धं सहते॒ ऽयं बा॑ध॒ते अ॒त्त्रिणः॑। अ॒यं नो॑ वि॒श्वभे॑षजो जङ्गि॒डः पा॒त्वंह॑सः ॥३॥
_(अयम्) यह (विश्वभेषजः) सर्वौषध (जङ्गिडः) पापों वा रोगों का भक्षक [परमेश्वर वा औषध] (विष्कन्धम्) विघ्न को (सहते) दबाता है, (अयम्) यही (अत्रिणः) खाउओं वा रोगों को (बाधते) रोकता है। (अयम्) यही (नः) हमको (अंहसः) पाप से (पातु) बचावे। _
उत्साही विचारवान् पुरुष परमेश्वर में विश्वास और पथ्य पदार्थों का सेवन करके अपनी दूरदर्शिता से मानसिक और शारीरिक बाधाओं को हटाकर अटल सुख भोगते हैं।
दे॒वैर्द॒त्तेन॑ म॒णिना॑ जङ्गि॒डेन॑ मयो॒भुवा॑। विष्क॑न्धं॒ सर्वा॒ रक्षां॑सि व्याया॒मे स॑हामहे ॥४॥
(देवैः) विद्वानों के (दत्तेन) दिये हुए [उपदेश किये हुए] (मणिना) मणि [अति श्रेष्ठ], (मयोभुवा) आनन्द के देनेहारे (जङ्गिडेन) रोगों के भक्षक [परमेश्वर वा औषध] द्वारा (विष्कन्धम्) विघ्न और (सर्वा=सर्वाणि) सब (रक्षांसि) राक्षसों को (व्यायामे) संग्राम में (सहामहे) हम दबावें।
मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के सत्सङ्ग से दुःखनाशक परमेश्वर के उपकारों पर दृष्टि करके पुरुषार्थ के साथ पथ्य द्रव्यों का सेवन करके विघ्नकारी दुष्ट जीवों, पापों और रोगों को हटाकर सदा आनन्द में रहें।
श॒णश्च॑ मा जङ्गि॒डश्च॒ विष्क॑न्धाद॒भि र॑क्षताम्। अर॑ण्याद॒न्य आभृ॑तः कृ॒ष्या अ॒न्यो रसे॑भ्यः ॥५॥
(च) निश्चय करके (शणः) आत्मदान वा उद्योग, (च) और (जङ्गिडः) रोगभक्षक परमेश्वर वा औषध दोनों, (मा) मुझको (विष्कन्धात्) विघ्न से (अभि) सर्वथा (रक्षताम्) बचावें। (अन्यः) एक (अरण्यात्) तप के साधन वा विद्याभ्यास से और (अन्यः) दूसरा (कृष्याः) कर्षण अर्थात् खोजने से (रसेभ्यः) रसों अर्थात् पराक्रमों वा आनन्दों के लिये (आभृतः) लाया जाता है।
आत्मदानी, उद्योगी, पथसेवी और परमेश्वर के विश्वासी पुरुष अपनी और सबकी रक्षा कर सकते हैं। वही योगीजन तपश्चर्या, विद्याभ्यास और खोज करने से आत्मदान [ध्यानशक्ति] और परमेश्वर में श्रद्धा प्राप्त करके अनेक सामर्थ्य और आनन्द का अनुभव करते हैं।
कृ॑त्या॒दूषि॑र॒यं म॒णिरथो॑ अराति॒दूषिः॑। अथो॒ सह॑स्वान् जङ्गि॒डः प्र ण॒ आयुं॑षि तारिषत् ॥६॥
(अयम्) यह (मणिः) प्रशंसनीय पदार्थ (कृत्यादूषिः) पीड़ा देनेहारी विरुद्ध क्रियाओं में दोष लगानेवाला, (अथो) और भी (अरातिदूषिः) अदानशीलों [कंजूसों] में दोष लगानेवाला है। (अथो) और भी (सहस्वान्) वही महाबली (जङ्गिडः) रोगभक्षक परमेश्वर वा औषध (नः) हमारे (आयूंषि) जीवनों को (प्र तारिषत्) बढ़तीवाला करे।
जो कुचाली मनुष्य विरुद्ध मार्ग में चलते और सत्य पुरुषार्थों में आत्मदान अर्थात् ध्यान नहीं करते, वे ईश्वरनियम से महा दुःख उठाते हैं। सत्यपराक्रमी और पथ्यसेवी पुरुष उस महाबली परमेश्वर के गुणों के अनुभव से अपने जीवन को बढ़ाते हैं, अर्थात् संसार में अनेक प्रकार से उन्नति करके आनन्द भोगते और अपना जन्म सफल करते हैं।
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