ईश्वर के अस्तित्व होने न होने पर कोई भी अपने विचार रख सकता है , चाहे वह व्यक्ति अनपढ़ से अनपढ़ हो या पढ़ा लिखा , इस मामले में सबके अपने विचार है , सबके अपने तर्क है , कुछ के सामान्य तर्क है तो कुछ के विशेष , हम यहाँ सामान्य और विशेष दोनों प्रकार के तर्कों को देखेंगे , तो आइये सबसे पहले देखते हैं की ईश्वर अस्तित्व के सबंध में सामान्य तर्क कौनसा है जो हर व्यक्ति के लिए प्रस्तुत करना सहज है , आसान है |
ईश्वर अस्तित्व के पक्ष में सामान्य तर्क
जब भी किसी भी आस्तिक को आप पूछेंगे कि ईश्वर का अस्तित्व कैसे है ? क्या प्रमाण है कि ईश्वर है तब एक सामान्य आस्तिक व्यक्ति आपको कहेगा
दुनिया में कोई भी वस्तु बिना किसी के बनाये नहीं बनती , इसलिए इस ब्रम्हांड को भी किसी ने बनाया है और वह बनाने वाला ही ईश्वर है |
तब एक नास्तिक व्यक्ति झट से कहेगा कि फिर ईश्वर को किसने बनाया ? जिसका जवाब आस्तिक नहीं दे पाता क्यों कि वह अपने तर्क को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं करता और आसान से तर्क को बड़ी उलझन बना बैठता है , वह कौनसी गलती करता जानने के लिए देखिये इस तर्क सही स्वरूप क्या है ?
वास्तविक तर्क
वास्तव में यह सामान्य तर्क अपने आप में काफी विशेष है , इस तर्क का सही स्वरुप यह है , तर्क कहता है
दुनिया में कोई भी बनी हुयी वस्तु बिना किसी के बनाये नहीं बनती , ब्रम्हांड निर्मित वस्तु है इसलिए उसका कोई निर्माता भी है |
अब नास्तिक पूछता है कि फिर ईश्वर को किसने बनाया ? आस्तिक कहता है –
जो वस्तु निर्मित है , बनी हुयी है उसे बनाने वाला होता है , जो निर्मित नहीं उसे कोई बनाने वाला नहीं होता , ब्रम्हांड निर्मित वस्तु है अतः उसका कोई निर्माता भी है |
देखिये एक छोटी सी गलती होने पर एक प्रबल तर्क दुर्बल दिखने लगता है , नास्तिकों के प्रिय सवाल ईश्वर को किसने बनाया के अनेकों जवाब दिए जा सकते है लेकिन यहाँ पर विषय यह नहीं है , इसके लिए नीचे दिया गया आर्टिकल पढ़े
आस्तिक और नास्तिक में बहस
ईश्वर अस्तित्व पर विशेष तर्क
तो आइये अब हम ईश्वर अस्तित्व के संबंध में कुछ विशेष तर्कों को देखते है , ईश्वर अस्तित्व के संबंध में महर्षि दयानन्द ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में यह तर्क दिया है जो कि अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है –
किसी भी वस्तु का अस्तित्व उसके गुणों से पता चलता है , गुणी की सत्ता गुणों से होती है , जैसे अग्नि का अस्तित्व उसके गुणों से प्रमाणित होता है , अग्नि में प्रकाश और तेज आदि गुण होने से उसके अस्तित्व का पता चलता है इसी तरह दुनिया में अनेकों वस्तुओं का अस्तित्व उनके गुणों से ही पता चलता है , उदाहरण के लिए हवा दिखाई नहीं देती लेकिन हम उसे स्पर्श कर सकते है , इसलिए उसमे स्पर्श का गुण होने से यह प्रमाणित होता है कि उसका अस्तित्व है , नमक, चीनी , गुड़ में स्वाद होने से उनके अस्तित्व का पता चलता है |
मान लीजिये कोई आपको चीनी देकर कहे कि ये नमक है , तब आप चखकर देखते हो तो आपको मीठापन महसूस होता है , आप कहते है ये नमक नहीं चीनी है , यानि कि जिस वस्तु को आपने चखा उसमे नमक के गुणों का नहीं बल्कि चीनी के गुणों का अस्तित्व है जिस से यह प्रमाणित हो गया कि यह अमुक वस्तु चीनी है , इसलिए हर वस्तु का अस्तित्व उसके गुणों से होता है |
पढ़िए –
ब्रम्हांड क्यों बना ?
जब हम इस ब्रम्हांड को देखते हैं इसकी विभिन्न क्रियाओ को देखते हैं यह सवाल हम सब के मन में उठता कि आखिर यह ब्रम्हांड कैसे बना ? इस एक सवाल की खोज में सालों से वैज्ञानिक लगे हुए हैं ,लेकिन इस सवाल के अलावा एक और सवाल है जो इस से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि यह ब्रम्हांड क्यों बना ? क्यों का महत्व कैसे से अधिक है , सबसे बड़ा सवाल ही “क्यों” है आपके घर में कोई व्यक्ति आता है तो आप सबसे पहले पूछते हो – क्यों आये , आप यह नहीं पूछते कि कैसे आये ? क्यों का महत्व कैसे से अधिक है , इसीलिए विज्ञान में यह भी एक सवाल आता है कि why the universe exist ?
“क्यों” को जानना दर्शन का क्षेत्र है और “कैसे” को जानना विज्ञान का क्षेत्र है , ब्रम्हांड कैसे बना यह विज्ञान बताएगा ? लेकिन ब्रम्हांड क्यों बना ये दर्शन बताएगा |
यदि यह माना जाये कि ब्रम्हांड अपने आप बना है तब इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं रह जाता है कि ब्रम्हांड क्यों बना ? क्यों कि अपने आप बनने की Theory में इसे या तो इसे आकस्मिक रूप से बना हुआ माना जाता है या स्वाभाविक रूप से यानि Naturally , दोनों ही संभावनाओं में कोई प्रयोजन या उद्देश्य नहीं होगा और बिना उद्देश्य के यह प्रश्न निराधार होगा , ब्रम्हांड में हर जगह नियम कार्य कर रहे हैं और ये नियम पूर्णता के साथ संचालित है |
ब्रम्हांड में हर जगह वैज्ञानिकता दिखाई देने के कारण अनेकों वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया कि इस ब्रम्हांड को बनाने वाली एक बुद्धिमान सत्ता जरूर है , वे सब वैज्ञानिक प्रचलित religions के ईश्वर को अवैज्ञानिक मानते हैं लेकिन वे एक बुद्धिमान सत्ता को जरूर स्वीकार करते हैं जिसका एक वैज्ञानिक स्वरूप(Scientific Form) है , वैज्ञानिकों के इन विचारों को जानने के लिए आप निम्न लेख पढ़ सकते हैं |
Scientists Accepted Scientific Form of God
इसलिए यह बात सिद्ध है कि ब्रम्हांड को किसी ने बनाया है और ऐसा होने पर यह प्रश्न बिलकुल उचित बैठता है कि ब्रम्हांड को क्यों बनाया ? इसका अस्तित्व क्यों है ?
दर्शन के क्षेत्र में उतरकर इस सवाल का जवाब हम एक विद्वान् की लेखनी से ही आपको दे रहे हैं , जिसे पढ़कर आप स्वयं उनकी विद्वता का अनुमान लगा लेंगे इसलिए उन विद्वान् का नाम लेना आवश्यक नहीं , लेख के अंत में ही उनका नाम पता चलेगा , तो चलिए शुरू करते हैं –
आज हमारे एक मेहरबान ने कहा कि
दिल में मेरे ये खयाल उत्पन्न होता है जब वह अपने आप में कोई कमी नहीं रखता | पूर्ण है !! Perfect है !!! तो दुनिया क्यों बनाई ?
मैंने कहा कि
यही दलील बनाने कि जरूरत को साबित करती है यानी उसका हर तरह से पूर्ण होना |
आप कहेंगे – कैसे ? जिसके अंदर कोई ख्वाहिश नहीं , कोई इच्छा नहीं ,कोई कमी नहीं , लेकिन पूर्णता है हर प्रकार की , इल्म भी उसका पूरा है , शक्ति भी उसमे पूरी है और व्यापकता भी उसकी पूरी है , तीनों प्रकार से जो पूरा है यानि परमात्मा ! तो बतलाइये वह अपनी पूर्णता को किस प्रकार सफल करे ? अपने इस कमाल को किस प्रकार बाकार करे ?
क्यों कि किसी शय का होना महज होने के लिए हो तो उसका होना न होने के बराबर होता है , जरा गौर कीजिये मेरे शब्दों पर , किसी वस्तु का होना महज होने के लिए हो तो उसका होना न होने के बराबर होता है | परमात्मा पूर्ण है अपनी पूर्णता का क्या लाभ ? अपने पुरे आलिम(काबिल) होने का क्या लाभ ? सूरज से प्रकाश हमको मिलता है , इस बल्ब से भी प्रकाश हमें मिलता है | हम पूछते है कि इसका इसके आलावा और कोई लाभ है कि आपको रोशनी दे रहा है ?
पूर्णता का होना इसी चीज में पूरा होगा कि जितना ज्यादा फायदा उसकी पूर्णता का यानी कमाल से दूसरे को हो जाये उतना ही उसका वजूद सफल है , और जितना न पहुंचे उतना असफल है |
आप कल्पना कीजिये कि – एक वजूद (अस्तित्व) है और उसके अलावा और कोई नहीं है तथा वही तो मैं कहूंगा उसका होना न होने के बराबर है |
उदाहरण के तौर पर अगर एक बड़ा डॉक्टर है , लेकिन बीमार कोई नहीं है और न दुनिया में दवाइयां है तो मुझे बताइये कि डॉक्टर के होने का क्या फायदा है ?
इसलिए विद्वान् लोगों ने कहा है कि जो अपने अंदर कोई गुण रखता है , उस गुण कि सफलता अन्य को लाभ पहुँचाने में है | अपनी आवश्यकता तो हम पूरी करते ही हैं , लेकिन अपने कमाल से गैरों की आवश्यकता को पूरा करना और उनके लिए सहारा बनना , यह ऊँचे दर्जे की बात है |
एक अंग्रेजी का बहुत छोटा सा जुमला है
Every opportunity to help is a duty.
प्रत्येक अवसर जो हमें सहायता का मिल जाये वह हमारा कर्त्तव्य है , जो मौका भी हमें मिल जाए किसी की मदद करने का वह हमारा फर्ज है , क्यों कि हम अपने गुण से कुछ तो फायदा पहुंचाए , अपने कमाल से उनको लाभान्वित करें |
मेरा बोलना तभी सफल है जब सुनने वाले हो , श्रोताओं के बिना मेरा बोलना सफल नहीं है , इसी तरह परमात्मा का वजूद कहाँ सफल होगा ? परमात्मा सर्वज्ञ है |
ज्ञान हमेशा अनपढ़ों में सफल होता है , ताकत हमेशा कमजोरों की रक्षा में सफल होती है , याद रखिये रोशनी हमेशा अँधेरे में सफल होती है , जहाँ अँधेरा है वही उसको ले जाइये रोशनी सफल हो जाएगी , जो ज्ञानी है , पढ़े लिखे है , वे अपनी जिंदगी को वहीँ सफल कर सकते हैं जहाँ अज्ञानी , अनपढ़ है , ताकि उनको कुछ पढ़ा सके , इस से पढ़े लिखे लोग सफल हो जायेंगे |
ईश्वर सर्वज्ञ है , सर्वज्ञ होने से उसकी जिम्मेदारी अपने आप सिद्ध है उसकी responsibility का आगाज स्वयं सिद्ध है , जब ईश्वर जानता है कि जीवात्मा अल्पज्ञ है , ज्ञान में कमजोर है , कम जानने वाला है और मैं (ईश्वर) सर्वज्ञ हूँ , सब कुछ जानने वाला हूँ तो इस से बेहतर और कौन सा मौका होगा ईश्वर के लिए कि वो अपने अस्तित्व को सफल कर सके , अपने ज्ञान को सफल कर सके , बेकार न जाने दे useful बनाये , unuseful न रहने दे |
सोचने की बात है कि इस हिसाब से ईश्वर ने क्या किया ? जीवात्मा हमेशा से उसके साथ है अनादि काल से तो अनादि काल से ईश्वर ने क्या समझा ? कि मेरी Duty है अब मेरा कर्त्तव्य है – Every opportunity to help is a duty और ये मौका ईश्वर को अनादि काल से मिला हुआ है वो अनादि काल – There is no beginning at all जहाँ कोई शुरुआत नहीं है तब से मिला हुआ है ,इसलिए ईश्वर सृष्टि रचना करके , जीवात्मा को ज्ञान प्रदान करता है और अपने अस्तित्व को सफल करता है |
परिवार में पिता के लिए बड़ा पछतावा होता है जब कोई उनको कहे कि आप इतने विद्वान और आपका बेटा जाहिल रह गया , क्या वजह ? इसलिए कहते हैं परमात्मा हमेशा से जानता है कि मेरा अपना ज्ञान जीवात्मा के होने से ही सफल है , यदि जीवात्मा न हो और प्रकृति न हो तो ईश्वर भी नही होगा , बल्कि न होने के बराबर होगा | किसके लिए होगा फिर वह ? अगर प्रकृति नहीं तो अपनी कारीगरी किसमें दिखाए ?
इसलिए ईश्वर के पास जीवात्मा हमेशा से है और प्रकृति भी हमेशा से है , यह देखकर वह खली कैसे बैठा रहे ? खली बैठने के लिए लोग क्या कहा करते हैं ?
An idle mind is devil’s workshop
यानि कि खाली दिमाग शैतान का घर , इसलिए यह सवाल हम मुसलमानों से किया करते हैं , आप यह बताइये कि जब अकेला खुदा ही था और कोई नहीं था तब खुदा किसके लिए था ? वे कहते हैं कि अपनी कुदरत दिखाने के लिए दुनिया पैदा की हम पूछते हैं किसको दिखाने के लिए ? जिसको दिखाना है वह तो पैदा ही नहीं हुआ था , जिसको दिखाना है वह पहले से होना चाहिए , नहीं है तो किसको दिखाता ?
इसलिए यहाँ एक कारण स्पष्ट है कि ईश्वर ने दुनिया को , ब्रम्हांड को जीवात्मा के लिए बनाया , इस कारण की विवेचना को आप ने ऊपर पढ़ा , यह पंडित रामचंद्र देहलवी जी की पुस्तक से लिया गया है , जिस पुस्तक का नाम ही है ” ईश्वर ने दुनिया क्यों बनाई “
आइये हम इस सवाल का एक दूसरा पक्ष देखते हैं , महर्षि दयानन्द अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में इस प्रश्न का जवाब देते है
(प्रश्न) जगत् के बनाने में परमेश्वर का क्या प्रयोजन है?
(उत्तर) नहीं बनाने में क्या प्रयोजन है?
(प्रश्न) जो न बनाता तो आनन्द में बना रहता और जीवों को भी सुख-दुःख प्राप्त न होता।
(उत्तर) यह आलसी और दरिद्र लोगों की बातें हैं पुरुषार्थी की नहीं और जीवों को प्रलय में क्या सुख वा दुःख है? जो सृष्टि के सुख दुःख की तुलना की जाय तो सुख कई गुना अधिक होता और बहुत से पवित्रात्मा जीव मुक्ति के साधन कर मोक्ष के आनन्द को भी प्राप्त होते हैं।
प्रलय में निकम्मे जैसे सुषुप्ति में पडे़ रहते हैं वैसे रहते हैं और प्रलय के पूर्व सृष्टि में जीवों के किये पाप पुण्य कर्मों का फल ईश्वर कैसे दे सकता और जीव क्यों कर भोग सकते? जो तुम से कोई पूछे कि आंख के होने में क्या प्रयोजन है? तुम यही कहोगे कि देखना |
तो जो ईश्वर में जगत् की रचना करने का विज्ञान, बल और क्रिया है उस का क्या प्रयोजन ? विना जगत् की उत्पत्ति करने के ? दूसरा कुछ भी न कह सकोगे। और परमात्मा के न्याय, धारण, दया आदि गुण भी तभी सार्थक हो सकते हैं जब जगत् को बनावे। उस का अनन्त सामर्थ्य जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और व्यवस्था करने ही से सफल है। जैसे नेत्र का स्वाभाविक गुण देखना है वैसे परमेश्वर का स्वाभाविक गुण जगत् की उत्पत्ति करके सब जीवों को असंख्य पदार्थ देकर परोपकार करना है।
यहाँ ऋषि ने स्पष्ट कर दिया कि इस सृष्टि के बनाने में ईश्वर का क्या उद्देश्य है , आशा है आपको यहाँ एक नई जानकारी मिली होगी इसलिए लेख को अपने दोस्तों के साथ share जरूर करें |
कौनसे गुण ईश्वर को प्रमाणित करते हैं ?
अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस तरह चीनी का गुण मीठापन है , अग्नि का गुण तेज और प्रकाश आदि है इसी तरह ईश्वर के वे कौनसे गुण है जिनसे उसका अस्तित्व साबित होता है ?
जिस तरह चीनी में मिठास है , इमली में खटास है , अग्नि में प्रकाश , वायु में स्पर्श और जल में गीलापन है उसी तरह ईश्वर तत्व में चेतनता है , ज्ञान है , बल है ,दया है , न्याय है | इस तरह ईश्वर तत्व में अनेकों गुण है |
लेकिन अभी सोच रहे होंगे कि जैसे हम मिठास को जानकर चीनी का पता कर लेते है , उसी तरह ईश्वर के इन गुणों को हम कैसे पता कर सकते है और जब हम ईश्वर के इन गुणों को महसूस नहीं कर सकते तब ईश्वर का अस्तित्व कैसे साबित होता है ?
ईश्वर के गुणों का कैसे पता चला ?
वायु को हम स्पर्श से जान सकते है , चीनी को हम चखकर जान सकते है तो भला ईश्वर को जब हम किसी भी इन्द्रिय से नहीं जान सकते तो कैसे प्रमाणित हुआ कि ईश्वर है ?
- ईश्वर को न चख सकते हैं
- न सूंघ सकते है
- न छू सकते हैं
- न सुन सकते हैं और
- न देख सकते हैं
फिर तो ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है ?
जवाब
ईश्वर का गुण है ज्ञान , जिस तरह किसी लेखक को जब आप पढ़ते हो तब उसे आप किसी भी इन्द्रिय से प्रत्यक्ष नहीं कर सकते लेकिन उस लेखक कि बुद्धि का दर्शन उसकी लेखनी में आपको हो जाता है , यानि आप अपनी बुद्धि से उस लेखक का प्रत्यक्ष करते हो , क्यों लेखक का लेख बुद्धिपूर्वक लिखा गया है इसलिए आप एक बुद्धिमान लेखक के अस्तित्व को स्वीकार करते हो , यदि उसका लेख मूर्खता पूर्ण है तब आप एक मूर्ख लेखक का अस्तित्व स्वीकार करते हो |
यहाँ आपने लेखक के गुणों का प्रत्यक्ष किसी भी इन्द्रिय से नहीं किया बल्कि अपनी बुद्धि से किया है , इसी तरह इस सम्पूर्ण ब्रम्हांड में सूक्ष्म से सूक्ष्म और बड़ी से बड़ी रचनाओं में उस ईश्वर की कला का दर्शन होता है , उसकी बुद्धि या उसके ज्ञान का दर्शन होता है , इसलिए एक सर्वज्ञ सत्ता का होना स्वीकार करना चाहिए |
- ईश्वर में स्पर्श गुण नहीं है
- रूप नहीं है |
- रस नहीं है |
- गंध नहीं है |
- शब्द नहीं है |
जब ईश्वर में ये गुण नहीं है तब उसका प्रत्यक्ष हमारी इन्द्रियों से क्यों होगा भला ? शुरुआत में हमने एक उदाहरण दिया था कि एक व्यक्ति की कोई भी इन्द्रिय काम नहीं करती है , यदि वो संसार के गुणों को अपनी इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं कर सकता तो इस कारण वह संसार के अस्तित्व को नकार नहीं सकता |
यहाँ पर बात थोड़ी उल्टी होकर भी वही है , यानि इसे ऐसे समझिये की वहाँ पर बात Active थी तो यहाँ पर Passive तरीके से है , हमारी इन्द्रियां ख़राब नहीं है लेकिन जिन गुणों को हमारी इन्द्रिय महसूस(sense) कर सकती है उनमे से कोई गुण ईश्वर में नहीं है ,दोनों ही जगह गुणों का प्रत्यक्ष नहीं हो रहा तब सबसे पहले दिया गया उदाहरण यहाँ Passive तरीके से काम करता है , क्या हम उस उदाहरण की तरह ईश्वर के अस्तित्व को नकार सकते हैं ?
ईश्वर के सभी गुणों का प्रत्यक्ष कैसे हो ?
जिस तरह हम किसी लेखक की पुस्तक को पढ़कर उसके ज्ञान के अनुसार लेखक का अस्तित्व स्वीकार कर लेते है और उस लेखक से चाहे तो मिल भी सकते हैं जिस से उसके अन्य गुणों का प्रत्यक्ष भी हमें हो जाता है उसी तरह ईश्वर के सभी गुणों का प्रत्यक्ष कैसे होगा , यह एक स्वाभाविक प्रश्न है |
जैसे पानी को देखकर आप उसके विभिन्न गुणों का अनुमान लगा सकते है , वैज्ञानिक बुद्धि से पानी के बहुत सारी चीजों को जान सकते हैं लेकिन पानी को पीने पर ही उसका वास्तव स्वाद महसूस होता है , इसी तरह ईश्वर को प्राप्त करने पर ही ईश्वर के सभी गुणों का प्रत्यक्ष होता है , एक चेतन ही दूसरे चेतन को महसूस कर सकता है , इसी तरह ईश्वर को प्राप्त करके ही उसे पूर्ण रूप से जाना जा सकता है और उसके अस्तित्व का पूरा उपयोग लिया जा सकता है |
जिस प्रकार किसी भी वस्तु को जानने व प्राप्त करके उसका उपयोग लेने की वैज्ञानिक प्रक्रिया होती है , उसी तरह ईश्वर को प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है , इस प्रक्रिया पर कभी और बात करेंगे , हाँ इतना जरूर कह दें की यह प्रक्रिया चमत्कार को नमस्कार करके बुद्धि बंद करने वाली नहीं बल्कि बुद्धि का पूर्ण प्रयोग करने वाली प्रक्रिया है , जिसमे पाखंड लेश मात्र भी नहीं है , इसलिए लेख को हम यही विराम देते है , आगे के विषयों पर बाद में लिखेंगे , ईश्वर के अस्तित्व पर आगे और भी नए लेख लिखे जायेंगे इसलिए आप हमारी website को Email से सब्सक्राइब कर सकते हैं | |
Three Cause of Universe
Efficient Cause
Efficient cause means the creator , any created thing cannot take form without a creator. A creator is always needed.
Material Cause
Any Created thing can never take form without a basic material.
Something can never come out of Nothing.
Normal Cause
It means that any created thing always need a purpose , creation cannot occur without purpose.
Here we have discussed about some preliminary concepts but our main focus will be only to the material cause of universe.
Currently, two main theories of creation of universe are popular –
- Big Bang Theory
- Steady State Theory
We believe these theories contains a lot of mistakes , So we are not going to discus modern theories instead we will talk about Vaidic Rashmi Theory.
भगवान को क्यों मानते हैं ?
आज दुनिया में करोड़ों लोग ईश्वर को मानते हैं लेकिन वे लोग ईश्वर को जानते नहीं इसीलिए पाखंड में फंसे रहते है |
जब तक हम किसी वस्तु को जानेंगे नहीं तब तक पाखंड में फंसते रहेंगे , कोई न कोई हमें ठग लेगा |
इसलिए पहले जानो फिर मानो |
अगर किसी व्यक्ति को नहीं पता कि किसी bank में पैसे जमा करने का तरीका क्या है तब कई लोग उसके पैसे ठगने के लिए उसे पागल बनाकर अपने बैंक में पैसे डलवा लेंगे |
इस तरह अनेकों बाबा ,मौलवी आदि लोग ईश्वर के नाम पर जनता को लूट लेते हैं , इसलिए ये जानना चाहिए कि ईश्वर कौन है , तब जाकर हम यह जानेंगे कि उस ऐसे ईश्वर को हमें क्यों मानना चाहिए ? उसके होने का हमें क्या फायदा है ?
जैसे यदि आप Albert Einstein को जानते हैं तो आप उसके होने का फायदा उठा सकते है , आज अल्बर्ट Einstein तो नहीं है लेकिन एक समय उनका अस्तित्व था |
आप उनके होने का फायदा उठा सकते है , आप उनको अपना आदर्श मानकर चल सकते है और उनके अच्छे गुणों को अपनाकर खुद भी अपने आप को जीवन में आगे ले जा सकते है |
Einstein में अनेकों अच्छे गुण थे लेकिन कुछ बुरे गुण भी किसी न किसी व्यक्ति में होते हैं इसलिए हमें ऐसी सत्ता को आदर्श बना चाहिए कि जिस से हम अच्छे गुण ही अपना पाए और बुरे गुण छोड़ पाएं |
सिर्फ ईश्वर ही ऐसा है जो शुद्ध है , पूर्ण है , इसलिए उसे जानकर हम अपने आप ऊपर उठा सकते हैं उसे जानकर स्वयं भी जीवन में आगे बढ़ सकते हैं |
जैसे आपके पास mobile फ़ोन है लेकिन आप उसका कभी उपयोग ही नहीं करते तो आपके लिए mobile का होना ,और न होना दोनों बराबर है |
अगर ईश्वर का अस्तित्व है , ऐसा जानकर भी आप उसका उपयोग न ले तो उसका होना , न होना एक जैसा है |
ईश्वर का उपयोग आप किस प्रकर ले सकते है आइये जानते है |
- आप ईश्वर के गुणों को जानकर के , जैसा ईश्वर महान वैसा स्वयं भी श्रीराम , श्रीकृष्ण आदि महापुरषों की तरह खुद को महान बना सकते हैं |
- ईश्वर को जानने पर ही आप सृष्टि विज्ञानं को जान सकते हैं , बिना ईश्वर को जाने सृष्टि विज्ञानं को पूरी तरह कभी नहीं जान सकते | इसलिए ईश्वर और सृष्टि दोनों का अध्ययन एक साथ जरुरी है |
- ईश्वर का वास्तविक वैज्ञानिक स्वरूप जानकर आप पाखंड से बच सकते है और अन्य पाखंडी मौलवी , बाबों का पर्दाफाश करके दुसरो को बचा सकते हैं |
- जब भी हम कोई गलत काम करते हैं तो हमरे हृदय में भय , शंका और लज्जा उत्पन्न होती है और अच्छा काम करने पर हमारे हृदय में उत्साह उत्पन्न होता है , ये प्रेरणा ईश्वर की और से ही होती है , हम ईश्वर की इस प्रेरणा को follow करके अपनी life में सही रस्ते पर ले जा सकते हैं |
- ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को जानकर हम दुनिया में शांति की स्थापना कर सकते हैं , ईश्वर को जानकर ही सृष्टि विज्ञानं को पूरी तरह से जान सकेंगे और उस पर आधारित ऐसी टेक्नोलॉजी बना सकेंगे जिसका पर्यावरण पर कोई बुरा प्रभाव न हो |
- ईश्वर को जानने पर हम पाप कर्म नहीं करेंगे क्यों की जैसे हम ाग्नि के बारे में जानते हैं की उसमे हाथ डालने पर हाथ जल जायेगा यानि की अग्नि अपना स्वाभाव नहीं छोड़ती उसी तरह ईश्वर सर्वव्यापक है , दुष्टों को दंड देना उसका स्वाभाव है , ईश्वर को सर्वव्यापक जानकर हम बुरे काम से बचेंगे , अन्यथा दंड मिलना स्वाभाविक है |
इस तरह ईश्वर नामक सत्ता के आप अनेकों उपयोग ले सकते हैं |
ईश्वर का उपयोग लेकर हम अपनी life को अच्छा बन सकते हैं इसलिए ईश्वर को मानते हैं |
क्या वैज्ञानिक भगवान को मानते है ?
अनेकों वैज्ञानिक ईश्वर का अस्तित्वस्वीकार करते है और अनेकों वैज्ञानिक ईश्वर की सत्ता को नहीं मानते |
लेकिन अगर हम बात करे की विज्ञानं ईश्वर को मानते है या नहीं , तब हम कहेंगे की वर्तमान विज्ञानं न तो ईश्वर के विरोध में है न ही ईश्वर के समर्थन में , क्यों कि वर्तमान विज्ञान अपूर्ण है , फिर भी वर्तमान विज्ञानं से ही ईश्वर का होना प्रूफ हो जाता है |
प्रसिद्द वैज्ञानिक Richard P. Feynman अपनी पुस्तक Lecture on Physics में ये स्वीकार करते है कि सृष्टि के सभी नियम ईश्वर द्वारा बनाये गए है जिनसे यह सृष्टि चल रही है |
इस विषय में आप हमारे लेख को पढ़ सकते हैं जहाँ ईश्वर को मानने वाले वैज्ञानिको के Quotes दिए गए है |
भगवान क्या चाहता है ?
भगवान यानि ईश्वर क्या चाहता है ?
यदि ईश्वर नामक किसी चेतन सत्ता का अस्तित्व है तो उसकी भी कोई इच्छा होगी ?
आखिर वह भगवान क्या चाहता है ? ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है |
ईश्वर में इच्छा नहीं होती , ईश्वर में ईक्षण होता है |
जिसकी कोई इच्छा होती है , उसमे कोई न कोई कमी होती है जिसकी पूर्ति के लिए वह इच्छा करता है , ईश्वर पूर्ण होने से उसमे कोई इच्छा नहीं होती |
ईश्वर में ईक्षण होता है यानि उसमे संकपल्प शक्ति होती है , क्यों ईश्वर सर्वज्ञ है इसलिए उसमे ईक्षण होता है , जो संकल्प स्वयं के स्वार्थ पूर्ति के लिए होता है उसे हम इच्छा कहते है लेकिन जो संकल्प परोपकार के लिए होता है उसे हम ईक्षण कह सकते है |
यदि ये पूछा जाये कि ईश्वर क्या चाहता है |
तो इसका जवाब है कि ईश्वर सबकी भलाई चाहता है |
क्यों कि ईश्वर का स्वभाव पवित्र है इसलिए इसलिए वह चाहता है कि सभी जीवात्मा उसके आदेश के अनुसार चले जिस से उनका भला हो , पाप से दूर रहकर पुण्य का कार्य करे ताकि सभी जीवों कि उन्नत्ति हो , यह ईश्वर का ईक्षण है |
भगवान कहाँ मिलेंगे ?
लोग पूछते है कि ईश्वर कहाँ रहता है या भगवान कहाँ मिलेंगे वगैरह वगैरह |
इसका जवाब है ईश्वर का कोई address पता नहीं है की वह कहाँ रहता है |
क्यों की ईश्वर किसी एक जगह नहीं रहता है , वह सर्वव्यापक होने से हर जगह है , हमारे अंदर भी है |
इसलिए ईश्वर हमारे अंदर मिलेगा |
भगवान से कैसे मिले ?
अगर address पता होता तो किसी को ये सवाल पूछने की जरूरत नहीं पड़ती की भगवन से कैसे मिले , अब तक सब लोग address पर जाकर पता कर लेते लेकिन जैसा की हमने कहा ईश्वर सर्वव्यापक है उसका कोई address नहीं है | वह हमारे अंदर ही है |
इसलिए ईश्वर से मिलना है तो अपने अंदर मिलो |
लेकिन कैसे ?
ईश्वर से मिलने के लिए आपको कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी |
किसी पीर , बाबा , मौलवी ,के पास तो बिलकुल भी नहीं जाना है |
जैसे UPSC exam pass करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है , तो ईश्वर से मिलने के लिए भी उस से कई गुना अधिक मेहनत करनी पड़ेगी |
ईश्वर से मिलने के लिए आपको बहुत पढाई करनी पड़ेगी |
हाँ ! सच में |
यजुर्वेद के मन्त्र “अन्धं तमः प्रविशन्ति……. | “ में कहा गया है कि
जो लोग सिर्फ प्रकृति कि उपासना करते है वे अंधकार में प्रविष्ट करते हैं लेकिन जो लोग सिर्फ ईश्वर कि ही उपासना करते है नवे और भी गहरे अंधकार में प्रविष्ट करते हैं |
मतलब ये हैं कि आपको एक साथ दोनों को जानना पड़ेगा |
क्यों कि वेदों के अनुसार अपरा विद्या का उत्तम फल ही पारा विद्या है यानि कि प्रकृति के विज्ञानं को जानने के बाद ही अध्यात्म विज्ञानं को हम अधिक समझ पते हैं |
अपरा विद्या का मतलब है सम्पूर्ण सृष्टि विज्ञान
परा विद्या का मतलब है अध्यात्म विज्ञान
बिना अपरा विद्या को जाने परा विद्या को नहीं जाना जा सकता है |
जितना सृष्टि को जानते है उतना ही ईश्वर को हम समझते जाते हैं | इसलिए इन दोनों का एक साथ अध्ययन और विचार करते रहना चाहिए |
जो व्यक्ति सृष्टि को जनता रहता है उसके स्वाभाव में परिवर्तन आता है , वह पहले कि अपेक्षा अधिक शांत , काम गुस्से वाला , काम भाव से रहित , लोग लालच से दूर हो जाता है |
यानि कि योगी बन जाता है |
योगी बनकर ही व्यक्ति ईश्वर को प्राप्त कर सकता है , इसलिए सबसे पहले सृष्टि को जानना पड़ेगा और साथ साथ ईश्वर विद्य पर चिंतन करना होगा तभी आप ईश्वर से मिल सकते हैं यानि कि ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं |
इसलिए ईश्वर से मिलने के लिए आपको निम्न कार्य करने होंगे |
- सम्पूर्ण सृष्टि के विज्ञान को जानना होगा |
- ईश्वर तत्व के विज्ञान को जानना होगा |
- जीवात्मा के विज्ञान को जानना होगा |
- जितना सृष्टि विज्ञान जानते है उसके साथ साथ अध्यात्म विज्ञान पर विचार करते रहना होगा , यानि परा और अपरा विद्या दोनों को एक साथ जानते रहना होगा |
- किसी बाबा , पीर ,फ़कीर के चक्कर में पड़ना नहीं होगा | इनको न सिर्फ avoid करना होगा बल्कि इनका प्रबल खंडन करते रहना चाहिए ताकि अन्य लगो को पाखंड में न फंसा सके |
- कर्म फल के विज्ञान को जानते हुए पुण्य कर्म करते रहना होगा , परोपकार के कार्य यानि मानवता के कार्य करते रहना होगा ताकि आपका स्वभाव परिवर्तित होकर आप अंतर्मुखी बन पाए |
- वास्तविक योग को अपनाना होगा यानि कि पतंजलि मुनि प्रणीत योग शास्त्र के अनुसार योगी बनाने का प्रयास करना होगा | सृष्टि को जानना भी योग का एक अंग है |
यह ईश्वर को प्राप्त करने का course है , इसे अपनाने पर किसी पाखंड में नहीं फंस पाएंगे |
वेदों के अनुसार सृष्टि को जाने बिना कभी ईश्वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता है |
कोई भी बाबा , मौलवी , पादरी सृष्टि को जानने कि बात नहीं करते हैं क्यों जिस दिन वे ऐसा करेंगे उनका पाखंड कभी चल नहीं पायेगा |
भगवान से प्रार्थना कैसे करे ?
अनेकों लोग सोचते हैं कि कोई भी काम बिना मेहनत के करके भगवन से ही सीधे मांग लेने से हो जायेगा , इसलिए वे असंख्य प्रार्थनाये करते रहते है |
अगर उन्हें प्रार्थना शब्द का अर्थ पता चल जाये तो वे लोग ईश्वर से रोज नयी नयी demand करना छोड़ देंगे |
प्रार्थना का मतलब होता है
किसी उचित कार्य के लिए अपने पूर्ण प्रयास के बाद स्वयं से अधिक बलवान से बल की सहायता मांगना , धनवान से धन की , बुद्धिमान से बुद्धि की , ज्ञानवान से ज्ञान की सहायता मांगना ही प्रार्थना है |
इस तरह पूर्ण प्रयास के बाद किसी भी प्रकार की सहायता की याचना करना ही प्रार्थना कहलाती है |
इसलिए सबसे पहले हमेशा उचित कार्य करें और फिर उस पर अपना पूर्ण प्रयास लगा दे , यदि इसके बाद में भी सफलता न मिले तब जाकर आप ईश्वर से सहायता की याचना करे तो यह प्रार्थना कहलायी जाएगी |
इसलिए ऐसी सच्ची प्रार्थना ही करें |
असली भगवान कौन है ?
आजकल नकली भगवानों का दौर चल रहा है |
कुछ भगवान तो अपने आप को कल्कि अवतार घोषित किये हुए है तो वहीँ कुछ अपने आप को सीधे भगवान यानि ईश्वर ही घोषित किये हुए है , उनमे से कुछ जेल की सलाखों के पीछे बैठे है |
ऐसे में असली भगवान की पहचान कर लेना काफी जरुरी हो गया है |
कोई भी मनुष्य कभी भी ईश्वर नहीं हो सकता है , यदि कोई मनुष्य अपने आप को ईश्वर या उसका पैगंबर घोषित करे तो समझ लजिए वो महा पाखंडी है , उस से दुरी बनाये रखें और उसका प्रबल खंडन करें |
असली भगवान आपके लिए आपके माता, पिता है , आपको कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं होगी |
इसके अलावा ईश्वर के बारे वेदादि शास्त्रों से आप जानते रहे , वह ईश्वर निराकार , सर्वज्ञ सर्वांतर्यामी , अजर , अम्र , अभी , नित्य , पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है , उसे जानने के लिए सृष्टि को जानने का प्रयास करते रहे |
भगवान एक है या अनेक ?
ईश्वर एक ही ही है अनेक नहीं |
दुर्भाग्य से आज हिन्दुओं ने अनेक ईश्वर मान लिए है , और 33 करोड़ तक पहुँच गए है जबकि वेद कहता है |
स एष एक-एक वृदेक एव
इस मन्त्र में ईश्वर को एक बताया है यानि ईश्वर सृष्टि की शुरुआत से लेकर अंत तक एक ही है ऐसा कहा गया है |
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् |
वेद मंत्र कहता है की इस सम्पूर्ण भूमंडल का स्वामी एक ही है |
इसलिए ईश्वर एक है, अनेक नहीं |
इस तरह हमने इन सवालों के जवाब आपके सामने रखें , अगर आपके मन और भी सवाल है तो आप कमेंट करके जरूर बताये , हम उनका जवाब देने का प्रयास करेंगे |
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